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नेताजी की प्रैक्टिकल एप्रोच और आज का कॉर्पोरेट वर्ल्ड - लॉयल्टी, लेटरल हायरिंग और वर्कप्लेस चेंज

 सन 1943 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज  के पुनर्गठन की जिम्मेदारी संभाली, तो उनके सामने सबसे बड़ा चैलेंज बेहद कम समय में एक अनुशासित, ट्रेंड और कॉम्बैट-रेडी सेना खड़ी करने का था। स्क्रैच से एक नया ढांचा तैयार करने में सालों लग जाते, जबकि परिस्थिति इमीडिएट एक्शन की मांग कर रही थी। ऐसे में नेताजी ने एक बेहद प्रेक्टिकल और रणनीतिक कदम उठाया। उन्होंने मुख्य रूप से उन भारतीय सैनिकों को आजाद हिंद फौज का आधार बनाया जो पहले ब्रिटिश सेना का हिस्सा थे। गौर करने वाली बात यह है कि ये सैनिक पहले उसी सिस्टम के लिए काम कर रहे थे, जिसके खिलाफ नेताजी का पूरा मिशन था।         नेताजी ने उनके पास्ट बैकग्राउंड के बजाय उनके स्किल्स, मिलिट्री ट्रेनिंग, स्ट्रेटेजिक माइंडसेट और एग्जीक्यूशन एबिलिटी पर भरोसा जताया। वो बहुत अच्छी तरह जानते थे कि केवल इमोशंस, नारों और पैशन से बड़े युद्ध नहीं जीते जाते; उसके लिए कड़े अनुशासन, डोमेन एक्सपीरियंस और एक्सपर्टाइज की जरूरत होती है। कैप्टन शाहनवाज खान, प्रेम सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों जैसे लीडर्स इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण बने कि...

वज़ीर: एक विचार के वटवृक्ष बनने की यात्रा

कहानियाँ हमेशा अपना रास्ता खुद चुनती हैं। ' वज़ीर ' की शुरुआत बहुत साधारण थी — जब अक्टूबर 2017 में इस कहानी का केंद्रीय विचार मन में आया, तब इसे केवल तीन अंकों की एक फ़ेसबुक पोस्ट होना था। मैंने पहले भी अपनी कहानियों को दो या तीन पोस्ट के माध्यम से क्रमवार तरीके से लिखा था, इसलिए यह तरीका मुझे सहज लगता था। लेकिन जैसे-जैसे मैंने इसे लिखना शुरू किया, मुझे समझ आ गया कि यह फ़ेसबुक के दायरे से बाहर रहकर ही पनप सकती है — लेकिन कितना? वो आगे मालूम पड़ने वाला था। वज़ीर का पहला ड्राफ्ट केवल सत्रह A4 पन्नों का था। इसमें केवल दो अध्यायों की रूपरेखा-मात्र थी और कथानक का मोटे तौर पर अंदाज़ा हो रहा था। दूसरे ड्राफ्ट में इसे विस्तार देकर लगभग पचास पेजों तक पहुँचाया, जिसमें कुछ घटनाओं के नाम और पात्रों की उपस्थिति की ओर संकेत के साथ ही बीज विचार का उल्कावत प्रस्फुटन था — वो प्रकट होता, कहानी में मोड़ की ज़रूरी वजह बनता और फिर कथा के अदृश्य आसमान में ग़ायब हो जाता; पीछे रह जाती उसे देखकर मन में उठी अधूरी इच्छाओं के पूरा होने की एक मौन ललक। इस रूप को जिसने भी पढ़ा, उसने पूरी कहानी पढ़ने की ज़ोरद...

पारिजात: जब सृष्टि सोती है, तब क्यों खिलता है हरसिंगार

जहां दूसरे फूलों का पूरा जीवन इसी संघर्ष में बीत जाता है कि वे वृक्ष की डाल पर किसी भी तरह टिके रहें, दूसरों से ऊपर दिखाई दें - अपना पारिजात उनसे अलग मार्ग पर चल पड़ता है। इस उद्यान में जब हर फूल अपने अस्तित्व को उच्च स्वर में गा कर सुना रहा है, वहीं हरसिंगार अपने आगमन को लेकर भी मौन ही रहता है। जब पूरी सृष्टि सो रही होती है, तब वह बिना किसी साक्षी के, करतल ध्वनियों की लालसा के बिना, अंधेरे की गोद में चुपके से जागता है, रात्री के आकाश को अपलक निहारता है मानों तारों से बनते, उभरते दैवीय संदेशों को पढ़ रहा हो और फिर अधरों पर एक मुस्कान लिए अपनी टहनी का संग छोड़ देता है।  क्या वो विधाता का लिखा कुछ ऐसा पढ़ लेता है जो सांसारिक आँखों से ओझल ही रहता है? उसका पूरा अस्तित्व ही झड़ जाने और बिखर जाने का उत्सव क्यों है? उसमें प्रातः काल के उगते सूर्य को देखने का भी मोह क्यों नहीं है ... कहीं दूर कोई गुरुदेव टैगोर के शब्दों को स्वर दे रहा है — मैं तो हताश और निराश था, मुझे लगा कि मेरा सारा प्रयत्न व्यर्थ चला गया। मुझमें तुम्हें खोजने की कोई शक्ति नहीं बची थी, परन्तु तुम मुझे खोज रहे थे। सुबह जब ...

Nokia 3310: The Immortal King of Cell Phones

आज जब चीजों की उम्र दिनों और हफ्तों में में नापी जाने लगी है तब ये सोचकर हैरानी होती है कि कभी 3310 जैसा एक फोन भी हुआ करता था, जो अमरौती खाकर जन्मा था; वो  यूं ही भूकंप के बाद ढही इमारतों के मलबे से हफ्तों बाद भी हँसते-मुसकुराते बाहर निकल आता, पानी में गिर जाये तो धूप में सूखते ही फिर गाने लगता, ट्रक के नीचे आ जाये तो फूँक मारते ही उठ खड़ा होता।      बनाने वालों ने उसमें बैटरी की बजाय एक ठौ परमाणु बिजली घर फिट किया था - तब दोपहर बारह बजे सोकर उठते ही एक-एक कर अपनी तमाम चांदो को फोन लगाना शुरू करो और रात को उगते चाँद की रोशनी में बैटरी पर नज़र डालो - तो वो वैसे ही टनाटन फुल; ज़िंदगी में रौनक उसी के कारण थी। चांद एक-एक कर बदलती रही, लेकिन वो वहीं का वहीं बना रहा - उसके बरोब्बर चल सके, इतना माद्दा किसी में था ही नहीं। 

पंगत का दर्शन : जीवन का स्वाद, संघर्ष और संतोष

 दौड़ कर पंगत में जगह घेर ली है, सांस ज़ोरों की चल रही हो लेकिन खुशी है कि पहला संघर्ष कामयाब रहा; दो साल तक किताबों के पीछे भागने के बाद आखिरकार ठीक-ठाक कॉलेज मिल गया है, खर्चे को लेकर सांस थोड़ी ऊपर नीचे हो गई थी लेकिन खुशी है कि पहली लड़ाई जीत ली।      नमक तो सभी की पत्तल पर रखा जा चुका है अब बस बाकी का इंतज़ार है, तभी हल्की सी हवा चली तो पत्तल उड़ने को बेसब्र हो उठी, जैसे-तैसे उस पर खाली कुल्हड़ धरकर उड़ने से बचाया; पढ़ाई तो खैर सभी की शुरू हो गई है, लेकिन अब बाकी सपनों का इंतज़ार है, इस बीच प्यार का एक छोटा सा झोंका क्या आया कि ज़िंदगी जीने को बेसब्र हो उठी, जैसे-तैसे खाली जेब का बोझ उस पर रखकर बहकने से बचाया। 

A Star Named 'Bibha': The Legacy of Bibha Chowdhuri

सुश्री बिभा चौधुरी ने कभी शादी नहीं की। वो कुल छह भाई-बहन थे, लेकिन उनकी बाकी चार बहनें और इकलौता भाई भी आजीवन अविवाहित ही रहे; तो दुनिया की सोच का वो हिस्सा, जो शादी को उपलब्धि के रूप में देखता है, इस बात को लेकर उनसे कोई शिकायत करता तो शायद अपनी इस ' अनुपलब्धि ' पर भी वो वैसे ही मुस्कुराकर मौन रह जाती, जैसी कि वो आजीवन अपनी उपलब्धियों को लेकर रहीं।      २३ वर्ष की आयु में १९३६ में कलकत्ता विश्वविद्यालय से भौतिकी में एमएससी करने वाली वो अकेली महिला थीं,

बड़े अच्छे लगते हैं: ख़ामोशी, संगीत और बिछोह के बीच पिरोई एक प्रेम-कथा

झील के किनारे गूँजती हुई वायलीन की उदास धुन हवा में धीमे-धीमे घुल रही है, परंपरा है कि हवा को अभी जाना होगा लेकिन झील को तो वहीं रहना हैं, ये बिछोह तो उसे सहना ही होगा और ये दर्द जैसे केवल हवा और झील का ही नहीं बल्कि उसके किनारे बैठे जोड़े का भी है। वर और वधू दोनों उसके किनारे बैठे हुए हैं और फिर लड़का बहुत हल्के संगीत के साथ धीमे से अपनी बात कह देता है, 'बड़े अच्छे लगते हैं, ये धरती, ये नदिया, ये रैना.... '  लड़की धीमे से पूछती है, 'और ....?' जब वो बोलती है तो पूरा संगीत थम जाता है, उसकी आवाज ही इतनी मधुर है कि उसके सामने संगीत का मौन रह जाना ही ठीक है; स्वर यदि पुरुष के पास हैं उन्हें सँवारने वाला संगीत स्वयं स्त्री है - और अब वही संगीत दूर जा रहा है ....