जहां दूसरे फूलों का पूरा जीवन इसी संघर्ष में बीत जाता है कि वे वृक्ष की डाल पर किसी भी तरह टिके रहें, दूसरों से ऊपर दिखाई दें - अपना पारिजात उनसे अलग मार्ग पर चल पड़ता है। इस उद्यान में जब हर फूल अपने अस्तित्व को उच्च स्वर में गा कर सुना रहा है, वहीं हरसिंगार अपने आगमन को लेकर भी मौन ही रहता है। जब पूरी सृष्टि सो रही होती है, तब वह बिना किसी साक्षी के, करतल ध्वनियों की लालसा के बिना, अंधेरे की गोद में चुपके से जागता है, रात्री के आकाश को अपलक निहारता है मानों तारों से बनते, उभरते दैवीय संदेशों को पढ़ रहा हो और फिर अधरों पर एक मुस्कान लिए अपनी टहनी का संग छोड़ देता है। क्या वो विधाता का लिखा कुछ ऐसा पढ़ लेता है जो सांसारिक आँखों से ओझल ही रहता है? उसका पूरा अस्तित्व ही झड़ जाने और बिखर जाने का उत्सव क्यों है? उसमें प्रातः काल के उगते सूर्य को देखने का भी मोह क्यों नहीं है ... कहीं दूर कोई गुरुदेव टैगोर के शब्दों को स्वर दे रहा है — मैं तो हताश और निराश था, मुझे लगा कि मेरा सारा प्रयत्न व्यर्थ चला गया। मुझमें तुम्हें खोजने की कोई शक्ति नहीं बची थी, परन्तु तुम मुझे खोज रहे थे। सुबह जब ...
Animesh Anant | Raag Bhopali
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